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अब आया न ऊंट पहाड़ के नीचे :क्या मोदी की पत्नी मुफ्त की

अब आया न ऊंट पहाड़ के नीचे ..

कमाल है  देश में कोई भी  मुद्दा  जिसमे  कांग्रेसी  फंसते  दिखाई  देते  हैं भाजपाइयों  का मुंह बड़ी तेज़ी से खुलता है और जब अपने नेता और वह  भी जिसे  बढ़ा  चढ़ा  कर  प्रधानमंत्री  पद  पर सजाने  की कोशिशें  जारी हैं पर आरोपों के थपेड़े पहुंचे आरम्भ होते हैं तब पहले कांग्रेसियों को वरीयता दे कहा जाता है की पहले आप  ……….सुनंदा पुष्कर जो की अब शशि थरूर जी की ब्याहता पत्नी हैं पर कटाक्ष करने के मामले में तो मुख़्तार अब्बास नकवी  एकदम बोल गए की लव गुरु थरूर को लव मिनिस्टर बनाओ: बीजेपी तब क्यों नहीं कहा की पहले कांग्रेसियों के द्वारा हमारे सामने स्थिति साफ की जाये तभी हम मुहं खोलेंगें अब उनके द्वारा स्थिति सफाई की अपेक्षा क्यों की जा रही है क्या उनकी पत्नी के बारे में अपने मुहं से फूल उगलने पर मोदी जी के द्वारा स्थिति साफ नहीं की जानी चाहिए थी .अब उनकी पत्नी के बारे में जानकारी जो की नवभारत टाइम्स पर प्रकाशित की gayi है पर एक नज़र डालें :-

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय

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यू ट्यूब से ली गई फोटो

नवभारतटाइम्स.कॉम | Nov 1, 2012, 06.50PM IST

शिमला।। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का झंडा बुलंद करने शिमला पहुंचे दिग्विजय सिंह ने कहा है कि दूसरे की पत्नियों पर अपमानजनक टिप्पणियां करने वाले नरेंद्र मोदी अपनी पत्नी के बारे में क्यों चुप हैं? उन्होंने दावा किया कि मोदी शादीशुदा हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा, ‘नरेंद्र मोदी की शादी यशोदा बेन से 1968 में हुई थी। यू-ट्यूब पर नरेंद्र मोदी की पत्नी का नाम और शादी के साक्ष्य मौजूद हैं।’

यहां देखें: यू ट्यूब का वह विडियो जिसमें यशोदा बेन नाम की महिला खुद को मोदी की पत्नी बताती हैं

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने नरेंद्र मोदी को सुनंदा पुष्कर पर दिए उनके बयान पर आड़े हाथों लिया। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिग्विजय ने कहा कि मोदी के बयान से महिलाओं का अपमान हुआ है। नरेंद्र मोदी ने हिमाचल प्रदेश में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा को 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड बताया था।

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी की पत्नी को लेकर लंबे समय से विवाद है। यह आरोप लगाया जाता है कि मोदी शादीशुदा हैं, मगर पत्नी के साथ नहीं रहते। कहा जाता है कि उनकी पत्नी एक टीचर हैं और गुजरात के एक गांव में अकेली रहती हैं। मोदी ने आधिकारिक तौर पर इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान विरोधियों की तरफ से यह बात बार-बार उठाई जाती है, लेकिन मोदी इसका न तो खंडन करते हैं और न पुष्टि।

दिग्गी राजा ने मोदी से पूछा कि सभी सांसदों और विधायकों को चुने जाने के बाद अपना मेरिटल स्टेटस दिखाना होता है, लेकिन नरेंद्र मोदी का मेरिटल स्टेटस आज तक ब्लैंक है, भला क्यों?

मोदी के बयान पर शशि थरूर का भी खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पत्नी हमेशा से अनमोल होती है और उसका प्यार भी। लेकिन यह वही जान सकता है जिसने कभी किसी से प्यार किया हो। दिग्विजय सिंह ने कहा कि मोदी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं और उनके बयान से महिलाओं का अपमान हुआ है।

बीजेपी ने भी टाला सवाल
50 करोड़ की गर्लफ्रेंड वाले बयान पर मोदी का साथ देने वाले बीजेपी नेताओं की कमी नहीं थी, मगर द्ग्विजय सिंह के इस आरोप के बाद कोई बीजेपी नेता मोदी का बचाव करता नहीं दिख रहा। मोदी की ही तरह बीजेपी भी इस आरोप की न तो पुष्टि कर रही है और न ही खंडन। गुरुवार को बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का ध्यान खास तौर पर दिग्विजय सिंह के इस बयान की ओर खींचा गया। इसके बावजूद वह इस सवाल को टाल गए। उन्होंनवे कहा कि पहले कांग्रेस साफ करे कि दिग्विजय सिंह किस हैसियत से यह सवाल उठा रहे हैं। क्या उनका यह कॉमेंट पार्टी का कॉमेंट माना जाए? उन्होंने कहा कि जब तक कांग्रेस इस बारे में स्थिति साफ नहीं करती, हम इस पर कुछ नहीं बोलेंगे।

अपनी पत्नी को इस तरह उपेक्षित जीवन देने वाले मोदी किस हक़ से दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप कर रहे हैं .रविशंकर जी स्वयं पहले ये बताएं की किस हक़ से या हैसियत से मोदी जी द्वारा शशि थरूर जे के जीवन साथी के बारे में ऐसी कुत्सित टिपण्णी वे कर रहे थे .और गडकरी जी आप भी जरा ध्यान दें अपने कल के वक्तव्य के बारे में जब आपने कहा था की मैं जाँच को तैयार वाड्रा भी करें जाँच का सामना अब अपने मोदी जी से कहिये की शशि जी की बीवी ५० करोड़ की है तो क्योंकि वे उसके खाते  में इतने रूपए रखते हैं फिर क्या उनकी बीवी मुफ्त की है जिसे वे गाँव में उपेक्षित रखते हैं मोदी जी के लिए ऐसे ही शब्द इस्तेमाल होंगे क्योंकि वे हर किसी की कीमत लगते हैं जरा ये भी बताते चलें की प्रधानमंत्री पद की क्या कीमत लगायी है?
                         शालिनी कौशिक
                                     [कौशल ]
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फ़िल्मी दुनिया को सम्भलना होगा

                                                     

 

यूँ तो फ़िल्मी दुनिया एक ऐसी दुनिया है जहाँ केवल तिलस्म ही तिलस्म है .जो दिखाई देता है वह कभी भी सच होगा इस विषय में विद्वान से विद्वान भी अपना सिर खुजाते हुए ही दिखाई देगा फिर भी आज जिसे देखो इसकी चकाचौंध के आगे अँधा हुआ है .योग्य से योग्य युवा इस ओर बढ़ रहे हैं लेकिन चिंता की बात ये नहीं है की योग्यता यहाँ प्रवेश कर रही है बल्कि चिंता यहाँ बढ़ते हुए झूठ ओर अयोग्यता को लेकर है .फ़िल्मी दुनिया के संस्थापकों में से प्रमुख दादा साहब फाल्के ने अपना जीवन ओर तन मन धन लगा इस दुनिया को स्थापित किया राज कपूर जी जैसे शो मैन ने अपनी अनूठी प्रतिभा से बोलीवूड का नाम विश्व में रोशन किया .सत्यजित रे ने अपनी फिल्मों के माध्यम से विश्व में भारतीय फिल्मों का परचम ऊँचा किया ऐसी ही अनूठी प्रतिभाओं से भरी है हमारी फ़िल्मी दुनिया .किन्तु अब अगर कोफ़्त  होती है तो वो यहाँ पर फिल्मों के गिरते स्तर को लेकर है और दिनों दिन ऐसी झूठे प्रचार को लेकर है जो फिल्मों के प्रति रूचि घटा ही रहा है इस वक़्त फिल्मो में कैटरीना कैफ बहुत नाम कमा रही हैं किन्तु सच में कहूं तो उनमे अभिनय प्रतिभा रत्तीभर भी नज़र नहीं आती वे पहली बात तो ये हिंदी फिल्मो में काम कर रही हैं किन्तु हिंदी अंग्रेजी की तरह बोलती  हैं और दुसरे भावशून्य अभिनय कर रही हैं .उन्हें हम ”मक्खन  की टिक्की ”तो कह सकते हैं किन्तु अभिनय में पारंगत नहीं कह सकते वे अपने अभिनय में रानी मुखर्जी ,करीना कपूर ,ऐश्वर्या राय के सम्मुख कहीं नहीं ठहरती .दूसरी एक और अभिनेत्री हैं जिन्हें  न देखना बर्दाश्त होता है न सुनना और वे हैं रीमा लम्बा मतलब फ़िल्मी दुनिया की ”मल्लिका शेरावत” जिनके बारे में अंतर्जाल से जो जानकारी मिली है वो कुछ यूँ है

 

 

Sherawat was born Reema Lamba in RohtakHaryana to a Jat family.[8] Mallika was born in the family of Seth Chhaju Ram, a leading Jat philanthropist.[9] She was born on 24 October, though the year is unknown.[10] She adopted the screen name of “Mallika”, meaning “empress”, to avoid confusion with other actresses named Reema.[11] “Sherawat” is her mother’s maiden name[10] She has stated that she uses her mother’s maiden name because of the support that her mother has provided her.[11] Although relations with her family were strained when she entered the film industry,[12] now Sherawat’s family have accepted her career choice and reconciled their relations.[9]

Sherawat went to school at Delhi Public School, Mathura Road.[13] She has obtained a degree in philosophy from Miranda HouseDelhi University.[14] During the initial days of her career, she claimed to have come from a very conservative small town family, and that she faced many hurdles from her family in pursuing her career.[15]However, Mallika’s family has refuted this as a story created by her to give her an aura of a small town rustic girl who made it big in Bollywood.[12] It has been reported that she was married for a short while to a Jet Airways pilot Captain Karan Singh Gill.[12]

ये न तो काम अच्छा करती हैं न ही बातें .अभी इन्होने कहा था की इनकी शादी की कोई इच्छा नहीं है तो इन्होने ये क्यूं नहीं कहा की दूसरी शादी की नहीं है जबकि पहली शादी भी ये खुद ही तोड़ कर आई हुई है अब बाकी तो शादी टूटने के बारे में या तो ये जानती हैं या कैप्टेन करण सिंह गिल .मुझे दिक्कत केवल ये है की ये सच क्यूं नहीं बोलती और क्यूं यहाँ टिकी रहकर फिल्मों का और हमारा जायका ख़राब कर रही हैं इस दुनिया को अगर टिके रहना है तो यहाँ योग्यता को ही स्थान मिलना चाहिए नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब ये दुनिया गहरे सागर में समां जाएगी इस वक़्त की फिल्मे तो इसके डूबने की ही ओर इशारा कर रही हैं

शालिनी कौशिक

अरविन्द की पार्टी :क्या अलग है इसमें -कुछ नहीं

अरविन्द की पार्टी :क्या अलग है इसमें -कुछ नहीं

 

”सुविधाएँ सारी घर में लाने के वास्ते , लोगों ने बेच डाला अपना ईमान अब ,

आखिर परों को काटकर सैय्याद ने कहा ,हे आसमां खुली भरो ऊँची उड़ान अब .”

नहीं जानती कि ये शेर किस मारूफ़ शायर का है किन्तु आज सुबह समाचार पत्रों में जब अरविन्द केजरीवाल की पार्टी की विशेषताओं को पढ़ा तो अरविन्द एक सैय्याद ही नज़र आये .जिन नियमों को बना वे अपनी पार्टी को जनता के द्वारा विशेष दर्जा दिलाना चाहते हैं वे ही उन्हें इस श्रेणी में रख रही हैं .उनके नियम एक बारगी ध्यान दीजिये –

१-एक परिवार से एक सदस्य के ही चुनाव लड़ने का नियम .

२-पार्टी का कोई भी सांसद ,विधायक लाल बत्ती का नहीं करेगा इस्तेमाल .
३-सुरक्षा और सरकारी बंगला नहीं लेंगे सांसद ,विधायक .
४-हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज करेंगे पार्टी पदाधिकारियों पर आरोपों की जाँच .
५-एक रूपये से उपर के सभी चंदे का हिसाब वेबसाईट पर डाला जायेगा .
क्या केवल गाँधी परिवार से अपनी पार्टी को अलग रखने के लिए एक परिवार एक सदस्य का नियम रखा गया है ?जब वकील का बच्चा वकील और डॉक्टर का बच्चा डॉक्टर बन सकता है तो नेता का बच्चा नेता क्यूं नहीं बन सकता ?चुनना तो जनता के हाथ में है .अब किसी नेता के परिवार के सदस्य में यदि हमारे नेतृत्व की ईमानदार नेतृत्व की क्षमता है तो ये नियम हमारे लिए ही नुकसानदायक है और दूसरे इसे बना भ्रष्टाचार पर जंजीरें डालना अरविन्द का भ्रम है हमने देखा है कितने ही लोग एक परिवार के सदस्य न होते हुए भी देश को चूना लगते हैं और मिलजुल कर भ्रष्टाचार करते हैं एक व्यक्ति जो कि ठेकेदारी के व्यवसाय में है  नगरपालिका का सभासद बनता है तो दूसरा [उसका मित्र -परिवार का सदस्य नहीं ]कभी ठेकेदारी का कोई अनुभव न होते हुए भी नगरपालिका से ठेके प्राप्त करता है और इस तरह मिलजुल भ्रष्टाचार को अंजाम देते हैं क्या यहाँ अरविन्द का एक परिवार एक सदस्य  का नियम कारगर रहेगा ?
लाल बत्ती का इस्तेमाल जनता के हितार्थ किया जाये तो इसमें क्या बुराई है कम से कम ये जनता के लिए एक पहचान तो है और इस पहचान को छीन वे कौन से भ्रष्टाचार को रोक पाएंगे ?
सुरक्षा का न लेना ”झीना हिकाका ”वाली स्थिति पैदा कर सकता है क्या ये देश के लिए देश की सुरक्षा के लिए भारी नहीं पड़ेगा ?
और सरकारी बंगला जनता को नेता से जोड़ने के लिए है जिसके माध्यम से सांसद ,विधायक जनता से सीधे जुड़ते हैं और उनके  परिवार के जीवन में कोई अनधिकृत  हस्तक्षेप भी नहीं होता  इसलिए इस नियम को भी व्यर्थ के प्रलाप की श्रेणी में रखा जा सकता है .
हाईकोर्ट जज द्वारा आरोपों की जाँच -क्या गारंटी है रिटायर्ड हाईकोर्ट जज के भ्रष्टाचारी न होने की ?क्या वे माननीय  पी.डी.दिनाकरण जी को भूल गए ?इसलिए ये नियम भी बेकार .
एक रूपये से ऊपर के चंदे का हिसाब -अभी शाम ही एक मेडिकल स्टोर पर देखा एक उपभोक्ता को दवाई के पैसे देने थे २००/-रूपये और उसने दिए १-१ रूपये के सिक्के .अब जो चंदा हिसाब से बाहर रखना होगा वह कहने को ऐसे भी लिया जा सकेगा तो उसका हिसाब कहाँ रखा जायेगा इसलिए ये नियम भी बेकार .
फिर अरविन्द केजरीवाल कह रहे हैं -”कि ये उनकी नहीं आम लोगों की पार्टी होगी ,जहाँ सारा फैसला जनता करेगी .”तो अरविन्द जी ये भारत है जहाँ लोकतंत्र है और जहाँ हर पार्टी जनता की ही है और हर नेता जनता के बीच में से ही सत्ता व् विपक्ष में पहुँचता है फिर इसमें ऐसी क्या विशेषता है जो ये भ्रष्टाचार के मुकाबले में खड़ी हो .अरविन्द जी के लिए तो एक शायर की ये पंक्तियाँ ही इस जंग के लिए मेरी नज़रों में उनके अभियान को सफल बनाने हेतु आवश्यक हैं-
”करें ये अहद कि औजारें जंग हैं जितने उन्हें मिटाना और खाक में मिलाना है ,
करें ये अहद कि सह्बाबे जंग हैं हमारे जितने उन्हें शराफत और इंसानियत सिखाना है .”
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

 

प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े

प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े

”सियासत को लहू पीने की लत है,
वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .”
ये पंक्तियाँ अक्षरश: खरी उतरती हैं सियासत पर ,जिस आरक्षण को दुर्बल व्यक्तियों को सशक्त व्यक्तियों से बचाकर पदों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था .जिसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक,सामाजिक ,शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को देश की मुख्य धारा में लाना था उसे सियासत ने सत्ता बनाये रखने के लिए ”वोट ” की राजनीति में तब्दील कर दिया .
सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया था .इसी साल अप्रैल में उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के पूर्ववर्ती मायावती सरकार के निर्णय को ख़ारिज कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरक़रार रखा और अखिलेश यादव सरकार ने इस फैसले पर फ़ौरन अमल के निर्देश दिए थे किन्तु वोट कि राजनीति इतनी अहम् है कि संविधान के संरक्षक ”उच्चतम न्यायालय ” के निर्णय के प्रभाव को दूर करने के लिए विधायिका नए नए विधेयक लाती रहती है और संविधान में अपना स्थान ऊँचा बनाने की कोशिश करती रहती है.जिस प्रोन्नति में आरक्षण को उच्चतम नयायालय ने मंडल आयोग के मामले में ख़ारिज कर दिया था उसे नकारने के लिए संसद ने ७७ वां संशोधन अधिनियम पारित कर अनुच्छेद १६ में एक नया खंड ४ क जोड़ा जो यह उपबंधित करता है –
”कि अनुच्छेद १६ में की कोई बात राज्य के अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के किसी वर्ग के लिए जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है प्रोन्नति के लिए आरक्षण के लिए कोई उपबंध करने से निवारित [वर्जित] नहीं करेगी.”
और इसके बाद ८५ वां संविधान संशोधन अधिनियम २००१ द्वारा खंड ४क में शब्दावली ”किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में” के स्थान पर ”किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में परिणामिक श्रेष्ठता के साथ ”शब्दावली अंतःस्थापित की गयी जो इस संशोधन अधिनियम को १७ जून १९९५ से लागू करती है जिस दिन ७७ वां संशोधन अधिनियम लागू हुआ .इसका परिणाम यह होगा कि अनुसूचित जाति व् जनजातियों के अभ्यर्थियों की श्रेष्ठता १९९५ से लागू मानी जाएगी .पहली बार ऐसा भूतलक्षी प्रभाव का संशोधन संविधान से धोखाधड़ी का प्रत्यक्ष प्रमाण है.
के सी वसंत कुमार के मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी थी कि अनुसूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति का आरक्षण सन २००० तक चलाया जाये और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की कसौटी आर्थिक हो तथा प्रत्येक ५ वर्ष पर इस पर पुनर्विचार हो .
भारत संघ बनाम वीरपाल चौहान [१९९५ ] ६ एस.सी.सी.६३४ में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया ”कि सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति के लिए ”जाति ”को आधार बनाया जाना संविधान के अनुच्छेद १६[४] का उल्लंघन है.
अनुच्छेद १६ के अनुसार-
”राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी.”
जिसका एक अपवाद १६[४] है जिसके अनुसार –
”राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्याधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है ,नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध कर सकता है
इस प्रकार खंड ४ के लागू होने की दो शर्ते हैं-
१-वर्ग पिछड़ा हो :अर्थात सामाजिक व् शैक्षिक दृष्टि से ,
2- उसे राज्याधीन पदों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिल सका हो.
केवल दूसरी शर्त ही एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती .ऐसे में सरकारी सेवा में लगे लोगों को पिछड़ा मानना सामाजिक रूप से उन लोगों के साथ तो अन्याय ही कहा जायेगा जो इनसे अधिक योग्यता रखकर भी सरकारी नौकरियों से वंचित हैं और इसके बाद प्रोन्नति में आरक्षण के लिए केंद्र सरकार का विधेयक लाने को तैयार होना सरकार का झुकना है और इस तरह कभी ममता बैनर्जी ,कभी करूणानिधि और कभी मायावती के आगे झुक सरकार अपनी कमजोरी ही दिखा रही है .यदि अनुसूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति देश में विकास पाने के आकांक्षी हैं तो अन्य जातियां भी उन्नति की महत्वाकांक्षा रखती हैं और एक लोकतंत्र तभी सफल कहा जायेगा जब वह अपने सभी नागरिकों से न्याय करे .पहले तो स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी आरक्षण लागू किया जाना ही गलत है इस पर प्रोन्नति में भी आरक्षण सरासर अन्याय ही कहा जायेगा .यदि ये जातियां अभी तक भी पिछड़ी हैं तो केवल नौकरी पाने तक ही सहायता ठीक है आगे बढ़ने के लिए तो इन्हें अपनी योग्यता ही साबित करनी चाहिए और सरकार को चाहिए की अपनी वोट की महत्वाकांक्षा में थोड़ी जगह ”योग्यता की उन्नति” को भी दे.नहीं तो योग्यता अंधेरों में धकेले जाने पर यही कहती नज़र आएगी जो ”हरी सिंह जिज्ञासु ”कह रहे हैं -‘
”अपने ही देश में हम पनाहगीर बन गए ,
गरीब गुरबां देश की जागीर बन गए ,
समझ नहीं आता कब बदलेगा यह परिवेश
दिखाते रहे जो रास्ता राहगीर बन गए.”
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

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